Saturday, 29 July 2017

मज़ा आ गया..


ख़ल्क़ जाने क्या खूबसूरती ख्वाबों की,

जैसे उसने काज़ल लगाई, मज़ा आ गया...

शबनम झूम कर रात भर यूँ गिरती रही,
जैसे सावन की बारिश, मज़ा आ गया..

क़ातिलाना ज़माना जाने क्या आशिक़ी,
जैसे उसकी अंगड़ाई, मज़ा आ गया..

क़ैद कर न सकोगे फिज़ा इश्क़ की,
उसकी बे-परवाही भी ऐसी, मज़ा आ गया..

~#aksh..
(after a long time, titled a writing 'maza aa gaya'..)
ORIGINALLY POSTED ON FACEBOOK ON 1Oth FEB , 2017
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Monday, 24 July 2017

कुछ कहते हैं

चलो कुछ कहते हैं,

बेज़ुबान रहे हदों तक,
आज बयां करते हैं..
ख़ामोशी सी पल रही,

कोई रौशनी दिल में,

बेखौफ होकर जीना है अब
आँधियों में,
जिसे इम्तहां कहते हैं..
होकर कंही गुमशुदा,
तलाशा खुद को हर दफा,
मिट जाएँ तो अब गम नही,
खुद को अब निशाँ कहते हैं..
है वजूद से क्या रिश्ता मेरा,
मैं मेरा वज़ूद हूँ,
बस इतनी सी बात है,
    और कुछ हम कहाँ कहते हैं.. :०

~#aksh..


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MYSELF
CLICKED ON DSLR CANON
ON THE HILL
DONGARGARH

यादें

जितना सहेजुं यादों को में अपनी किसी उम्र की, तो बस यादें रहने लगी है.. वो जो हमसफ़र था कहीं दूर खोता जा रहा है...