Sunday, 4 June 2017

लफ़्ज़

              कुछ कहूँ तो लब रुक जाते हैं..
           कुछ लिखूं तो 'लफ्ज़' थम जाते हैं..
            आदत में खुद की ढल सा गया हूँ
     न् जाने कब चलते चलते कदम रुक जाते हैं..
    सफर ये तन्हा था, या सफर में मैं तन्हा सा,
           यूँ कहूँ तो हर रात ढल जाते हैं,
     बिन मिले कई मुलाक़ात बदल जाते हैं..
         ऐसे न् जाने कितने बात रह जाते हैं,
        आँखों आँखों में बरसात रह जाते हैं..
     चुभती है जैसे ज़मीं को बारिश की कमी,
    इन सफर में कई अनकही शाम रह जाते हैं
           यादों में कई मुकाम रह जाते हैं,
      फिर खुद में हम थोड़े कम रह जाते हैं..
         कुछ लिखूं तो लफ्ज़ थम जाते हैं....
     
                       ~#aksh....


                       

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यादें

जितना सहेजुं यादों को में अपनी किसी उम्र की, तो बस यादें रहने लगी है.. वो जो हमसफ़र था कहीं दूर खोता जा रहा है...