कुछ कहूँ तो लब रुक जाते हैं..
कुछ लिखूं तो 'लफ्ज़' थम जाते हैं..
आदत में खुद की ढल सा गया हूँ
न् जाने कब चलते चलते कदम रुक जाते हैं..
सफर ये तन्हा था, या सफर में मैं तन्हा सा,
यूँ कहूँ तो हर रात ढल जाते हैं,
बिन मिले कई मुलाक़ात बदल जाते हैं..
ऐसे न् जाने कितने बात रह जाते हैं,
आँखों आँखों में बरसात रह जाते हैं..
चुभती है जैसे ज़मीं को बारिश की कमी,
इन सफर में कई अनकही शाम रह जाते हैं
यादों में कई मुकाम रह जाते हैं,
फिर खुद में हम थोड़े कम रह जाते हैं..
कुछ लिखूं तो लफ्ज़ थम जाते हैं....
~#aksh....
कुछ लिखूं तो 'लफ्ज़' थम जाते हैं..
आदत में खुद की ढल सा गया हूँ
न् जाने कब चलते चलते कदम रुक जाते हैं..
सफर ये तन्हा था, या सफर में मैं तन्हा सा,
यूँ कहूँ तो हर रात ढल जाते हैं,
बिन मिले कई मुलाक़ात बदल जाते हैं..
ऐसे न् जाने कितने बात रह जाते हैं,
आँखों आँखों में बरसात रह जाते हैं..
चुभती है जैसे ज़मीं को बारिश की कमी,
इन सफर में कई अनकही शाम रह जाते हैं
यादों में कई मुकाम रह जाते हैं,
फिर खुद में हम थोड़े कम रह जाते हैं..
कुछ लिखूं तो लफ्ज़ थम जाते हैं....
~#aksh....

No comments:
Post a Comment
Thank you , for your views.